Ziyarat E Nahiya In Hindi !full! -
It is recommended to recite Ziyarat-e-Nahiya on the Day of Ashura, which falls on the 10th of Muharram. Shia Muslims around the world recite this ziyarat in congregation, often in masjids (mosques) or husseiniyas (Shi'ite religious centers). The ziyarat is usually recited after the Maghrib (sunset) prayer.
यह ज़ीयारत अन्य सामान्य ज़ीयारतों से काफी अलग है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
यह ज़ीयारत प्राचीन और विश्वसनीय शिया किताबों में दर्ज है:
The Ziyarat describes how the heavens, the earth, the oceans, and the angels wept for the tragedy of Karbala.
'नाहिया' (Nahiya) शब्द का अर्थ है 'क्षेत्र' या 'पक्ष'। ज़ियारत-ए-नाहिया के संदर्भ में यह एक गुप्त या संकेतात्मक शब्द था। इस्लामी इतिहास के एक दौर में, जब इमामों पर कठोर राजनीतिक दबाव और अत्याचार होते थे, तो अनुयायी उनका नाम लेने से बचते थे। उन्होंने इमामों के लिए 'नाहिया' यानी 'संरक्षित क्षेत्र' या 'पवित्र क्षेत्र' (अल-नाहिया अल-मुकद्दसा) जैसे गुप्त नामों का प्रयोग किया। इस प्रकार, 'ज़ियारत-ए-नाहिया' का तात्पर्य उस ज़ियारत से है जो उस पवित्र सत्ता (जिसका संकेत इस शब्द से दिया जाता था) द्वारा प्रदान की गई थी, यानी इमाम महदी (अ.स.)। ziyarat e nahiya in hindi
इसमें वह मशहूर जुमला आता है जहाँ इमाम महदी (A.S.) कहते हैं कि "अगर मैं उस वक़्त (कर्बला में) मौजूद न था, तो मैं आपके गम में सुबह और शाम रोऊँगा और आँसुओं के बजाय खून के आंसू बहाऊंगा" . कहाँ से पढ़ें?
इसमें यह बताया गया है कि इमाम हुसैन की शहादत पर केवल इंसान ही नहीं, बल्कि फरिश्ते, जिन्नात, ज़मीन और आसमान की हर चीज़ रोई है。 आध्यात्मिक गहराइयाँ
ज़ियारत की शुरुआत आदम (अ) से लेकर हज़रत मोहम्मद (स) और सभी पाक इमामों पर सलाम से होती है। यह दिखाता है कि इमाम हुसैन (अ) का मिशन कोई नया मिशन नहीं था, बल्कि यह सभी नबियों के दीन को बचाने का सिलसिला था।
ज़ीयारत-ए-नाहिया हिंदी में (Ziyarat e Nahiya Text Snippet in Hindi) It is recommended to recite Ziyarat-e-Nahiya on the
The full ziyarat is as follows:
(Ziyarat al-Nahiya al-Muqaddasa) शिया इस्लाम में एक अत्यंत भावुक और गहरा आध्यात्मिक पाठ है, जिसका शाब्दिक अर्थ "पवित्र क्षेत्र की ज़ियारत" है। यह विशेष रूप से कर्बला के शहीदों और इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत के प्रति इमाम-ए-ज़माना (अ.त.फ़.श.) की श्रद्धांजलि मानी जाती है।
Ziyarat-e-Nahiya (the Pilgrimage of the Sacred Side) is a deeply moving and tragic salutation traditionally attributed to the 12th Imam, Imam Mahdi (atfs) , regarding the tragedy of Karbala. Key Features of Ziyarat-e-Nahiya Authorship and Origin
इस ज़ियारत के अलफ़ाज़ इतने पुरअसर हैं कि यह कड़े से कड़े दिल को भी पिघला देते हैं और इंसान में इंसानियत और हमदर्दी की भावना जगाते हैं। निष्कर्ष Imam Mahdi (atfs)
अंजुमनों और मातमदारों के लिए हिंदी लिपि में ज़ियारत को पढ़ना और याद करना आसान हो जाता है।
अहलेबैत (अ.स.) के दुखों पर आंसू बहाना और उनकी ज़ियारत पढ़ना गुनाहों के कफ़ारे का जरिया बनता है।
It is used in Madrasas and during Majalis to teach children about the sacrifices made at Karbala. 4. Structure of a Typical Hindi Recitation
"ज़ियारत-ए-नाहिया" इस्लाम के इतिहास में एक अत्यंत भावुक और महत्वपूर्ण प्रार्थना है। यह ज़ियारत इमाम-ए-ज़माना (हज़रत महदी अ.स.) से संबंधित मानी जाती है। इसमें कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके वफादार साथियों पर हुए अत्याचारों का वर्णन अत्यंत मार्मिक ढंग से किया गया है। 'नाहिया' शब्द का अर्थ है 'क्षेत्र' या 'दिशा', जो उस समय इमाम के गुप्त निवास की ओर संकेत करता था। ऐतिहासिक महत्व
"अस्सलामु अलैका या अबू अब्दिल्लाह, अस्सलामु अलैका या حुसैन, अस्सलामु अलैका या खैर अन्नास, अस्सलामु अलैका या नूर अल्लाह, अस्सलामु अलैका या حجة الله,
विशिष्ट भाग का हिंदी अनुवाद या इसके इतिहास
